

निरंजन महावर
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति,
कला और परम्पराओं के साहित्यकार
सामान्य परिचय
निरंजन महावर एक जाने-माने विद्वान, लेखक और कला-संग्रहकर्ता हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन भारतीय आदिवासी और लोक संस्कृति को सहेजने में लगा दिया है। साल 1960 में सागर यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में एम.ए. करने के बाद, वे 1962 में अपने पारिवारिक व्यवसाय को संभालने के लिए बस्तर चले गए। यही वह मोड़ था जिसने उनके जीवन की दिशा तय कर दी। यहाँ की समृद्ध आदिवासी परंपराओं और जीवंत कलात्मक विरासत ने उनके दिल को गहराई से छू लिया। पिछले चार दशकों से भी ज़्यादा समय से, श्री महावर आदिवासी जीवन को बहुत बारीकी से देख और समझ रहे हैं। उनका मुख्य ध्यान वहां की पौराणिक कथाओं, लोक नाटकों और पारंपरिक ज्ञान को दर्ज (document) करने पर रहा है। उनके इसी गहरे शोध का नतीजा है कि आज आदिवासी कलाओं पर उनकी पाँच किताबें, लोक नाटकों पर आठ और आदिवासी अध्ययन पर चार विशेष शोध-पत्र उपलब्ध हैं। उनकी कुछ प्रमुख किताबों में 'बस्तर ब्रॉन्ज़ेस: ट्राइबल रिलिजन एंड आर्ट' (Bastar Bronzes: Tribal Religion and Art) और 'पांडवानी: अ फोक थिएटर बेस्ड ऑन एपिक महाभारत' (Pandavani: A Folk Theatre Based on Epic Mahabharat) शामिल हैं। सिर्फ़ लेखन ही नहीं, श्री महावर को बस्तर, ओडिशा और पश्चिम बंगाल की दुर्लभ कलाकृतियों को इकट्ठा करने का भी गहरा शौक है। संस्कृति को बचाने की अपनी इसी लगन के चलते, उन्होंने बस्तर स्थित 'एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया' के म्यूज़ियम को लगभग 600 टेराकोटा कलाकृतियां दान में दे दीं। वे 'मध्य प्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद' में विशेषज्ञ के तौर पर अपनी सेवाएँ दे चुके हैं। इसके अलावा, वे 20 सालों तक 'चौमासा' (Choumasa) पत्रिका के सलाहकार बोर्ड में भी रहे। उन्होंने उत्तर भारतीय भाषाओं के लोक-साहित्य पर एक विशाल विश्वकोश (encyclopedia) भी तैयार किया है। उनका पूरा जीवन आदिवासी भारत की सांस्कृतिक आत्मा को सहेजने और उसे दुनिया तक पहुँचाने के लिए एक मज़बूत पुल की तरह है।

















